758वें उर्स-ए-साबिर पाक में रूहानी परंपरा का आगाज़, 7 रबीउल अव्वल से खानकाहों पर पहुंचने लगा लंगर
758वें उर्स-ए-साबिर पाक में रूहानी परंपरा का आगाज़, 7 रबीउल अव्वल से खानकाहों पर पहुंचने लगा लंगर
पिरान कलियर। हज़रत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक के 758वें सालाना उर्स मुबारक के मौके पर शुक्रवार, 7 रबीउल अव्वल से बड़े लंगर की तकसीम का सिलसिला शुरू हो गया। उर्स के दौरान लंगर वितरण की व्यवस्था में परंपरागत रूप से बदलाव किया जाता है और 7 रबीउल अव्वल से लंगर उठाकर विभिन्न खानकाहों, सूफियों की गद्दियों और रूहानी डेरे तक पहुंचाया जाता है।
बताया जाता है कि यह ऐतिहासिक परंपरा वर्ष 1903 में तत्कालीन सज्जादा नशीन शाह अब्दुर्रहीम साहब ने शुरू की थी। उस समय से देश की विभिन्न खानकाहों के सज्जादा नशीनों, खुद्दामों और सूफियों के डेरे तक साबिर पाक की दरगाह से लंगर पहुंचाने की परंपरा चली आ रही है। करीब 123 वर्षों से यह रूहानी परंपरा बदस्तूर जारी है।
उर्स मुबारक के दौरान 7 रबीउल अव्वल से 12 रबीउल अव्वल तक लंगर को विशेष रूप से खानकाहों और सूफियों की गद्दियों पर पहुंचाया जाता है। इसके अलावा मस्त कलंदर के धूने, मदार चौक, जलाली चौक, रिफाई चौक और बनवा चौक सहित विभिन्न रूहानी स्थलों पर भी लंगर वितरित किया जाता है।
शुक्रवार को सज्जादा नशीन प्रतिनिधि शाह सुहैल की निगरानी में दरगाह कार्यालय की ओर से सुपरवाइज़र असलम कुरैशी की सरपरस्ती में लंगर वितरण का आगाज़ किया गया। इस दौरान खानकाहों और रूहानी स्थलों तक लंगर पहुंचाया गया।
साबिर पाक के उर्स में लंगर की यह परंपरा महज़ भोजन वितरण नहीं, बल्कि खानकाही अदब, सूफियाना भाईचारे और सदियों पुरानी रूहानी विरासत की निशानी मानी जाती है। 123 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी अकीदत और एहतराम के साथ निभाई जा रही है, जो पिरान कलियर की रूहानी पहचान को और मजबूत करती है।
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