खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान दुनिया जिन्हें बादशाह खान के नाम से जानती थी महात्मा गांधी के बेहद करीबी साथी थे

Jan 21, 2026 - 14:14
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खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान दुनिया जिन्हें बादशाह खान के नाम से जानती थी महात्मा गांधी के बेहद करीबी साथी थे

ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान जिन्हें दुनिया बादशाह ख़ान के नाम से जानती है, महात्मा गांधी जी के बेहद क़रीबी साथी थे और उन्हें सीमांत गांधी भी कहा जाता है। बादशाह ख़ान हमेशा अपने साथ एक छोटी सी पोटली यानी कपड़े की गठरी रखते थे, जो उनकी सादगी की पहचान बन चुकी थी। सन 1969 में गांधी जी की जन्म शताब्दी के मौक़े पर इंदिरा गांधी के विशेष आग्रह पर वे इलाज के लिए भारत आए। जब वे हवाई अड्डे पर उतरे तो उनके हाथ में वही पुरानी पोटली थी। इंदिरा गांधी ने आदर से कहा कि यह हमें दे दीजिए, हम ले चलते हैं। इस पर बादशाह ख़ान कुछ पल रुके और बहुत ठंडे और सुकून भरे लहजे में बोले  “यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी?” उनके इस एक वाक्य में बँटवारे का सारा दर्द, मातृभूमि से जुदाई और जीवन भर के त्याग की टीस साफ झलक पड़ी। यह सुनकर जे.पी. नारायण और इंदिरा गांधी दोनों ने सिर झुका लिया और जे.पी. अपनी भावनाओं पर क़ाबू न रख सके, उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
सन 1985 में कांग्रेस स्थापना शताब्दी के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बादशाह ख़ान को दोबारा विशेष अतिथि के रूप में भारत आमंत्रित किया। जब वे भारत पहुँचे तो इस बार भी उनके हाथ में वही पोटली थी जो वे 1969 में साथ लाए थे। राजीव गांधी इस पोटली के बारे में जानते थे, उन्होंने आदर से कहा कि आपने कभी महात्मा गांधी या इंदिरा जी को भी इसे हाथ नहीं लगाने दिया, लेकिन अगर आप इजाज़त दें तो क्या मैं इसे खोलकर देख सकता हूँ। बादशाह ख़ान मुस्कुराए और अपने पठानी अंदाज़ में बोले  “तू तो हमारा बच्चा है, देख ले, नहीं तो लोग समझते रहेंगे कि बादशाह इस पोटली में क्या छुपाकर फिरता है।” जब पोटली खोली गई तो उसके अंदर सिर्फ़ दो जोड़ी लाल कुर्ता-पाजामा थे।
सन 1987 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा। बादशाह ख़ान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़े हुए थे, पख़्तून ज़मींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे, उनके भाई लंदन से डॉक्टर बनकर लौटे थे और सीमांत प्रांत के मुख्यमंत्री भी रहे, लेकिन इतनी हैसियत, रुतबा और इज़्ज़त होने के बावजूद उन्होंने पूरी ज़िंदगी सादगी, सब्र और अहिंसा के रास्ते पर गुज़ार दी। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के ऐसे सच्चे पैरोकार बहुत कम पैदा होते हैं। नाम उनका बादशाह था, मगर ज़िंदगी फक़ीरों से भी ज़्यादा सादा रही। सलाम है ऐसी अज़ीम और इंसानियत से भरी हुई शख़्सियत को।

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