पिरान कलियर दरगाह में ‘दुकान खेल’ ? अकाउंटेंट-सुपरवाइजर की कार्यशैली पर उठे सवाल, बिना नीलामी किसके इशारे पर दिलाया कब्जा..!
पिरान कलियर दरगाह में ‘दुकान खेल’ ? अकाउंटेंट-सुपरवाइजर की कार्यशैली पर उठे सवाल, बिना नीलामी किसके इशारे पर दिलाया कब्जा..!
पिरान कलियर: वक्फ दरगाह पिरान कलियर की व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। जिला प्रशासन के अधीन संचालित दरगाह दफ्तर में नियम-कायदों की अनदेखी कर कर्मचारियों द्वारा मनमाने तरीके से दुकान पर कब्जा दिलाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि हज हाउस मार्ग स्थित नीलामी वाली दुकान नम्बर-3 पर बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के पुराने दुकानदार को हटाकर दूसरे व्यक्ति को बैठा दिया गया।
बताया जा रहा है कि मंगलवार को दरगाह दफ्तर में तैनात अकाउंटेंट सद्दाम हुसैन, सुपरवाइजर इंतेखाब आलम और कुछ पीआरडी कर्मी मौके पर पहुंचे। आरोप है कि उनकी मौजूदगी में पहले से दुकान चला रहे व्यक्ति को हटाया गया और दूसरे व्यक्ति को कब्जा दिलाया गया। इतना ही नहीं, दुकान में बर्तन, भगोने, लकड़ी के तख्त समेत अन्य सामान भी रखवाया गया, जिससे पूरा घटनाक्रम किसी “तयशुदा सेटिंग” जैसा नजर आया।
हैरानी की बात यह है कि जिस व्यक्ति को दुकान पर बैठाया गया, उसके नाम न तो कोई नीलामी हुई थी और न ही अस्थायी आवंटन की कोई आधिकारिक प्रक्रिया अपनाई गई। जबकि हज हाउस मार्ग की चारों दुकानों की नीलामी प्रक्रिया अभी शुरू तक नहीं हुई है। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर दुकान नम्बर-3 पर यह “विशेष कृपा” किसके इशारे पर दिखाई गई।
मामले में दरगाह प्रबंधक एवं तहसीलदार विकास अवस्थी ने कहा कि केवल किराया जमा न होने के कारण दुकान खाली कराने के निर्देश दिए गए थे। किसी दूसरे व्यक्ति को कब्जा दिलाने की जानकारी उन्हें नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि नियम विरुद्ध तरीके से किसी को बैठाया गया है तो मामले की जांच कर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही उन्होंने बताया कि सभी दुकानों की नीलामी प्रक्रिया जल्द कराई जाएगी।
घटनाक्रम के बाद अब दरगाह दफ्तर की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। क्या कुछ कर्मचारी अपनी मर्जी से सरकारी संपत्तियों का संचालन कर रहे हैं.? क्या बिना प्रशासनिक अनुमति के किसी को दुकान पर बैठाना संभव है.? या फिर इसके पीछे कोई अंदरूनी मिलीभगत काम कर रही है.?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि दरगाह जैसी संवेदनशील धार्मिक संस्था में भी नियमों को ताक पर रखकर फैसले होने लगें, तो पारदर्शिता और प्रशासनिक नियंत्रण दोनों पर सवाल उठना लाजिमी है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि मामले में सिर्फ जांच की औपचारिकता होती है या वास्तव में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कर व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की कोशिश की जाती है।
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