सच्चाई के साथ, हर कदम आपके साथ कर्बला की अमर दास्तान: हज़रत अब्बास अलमबरदार की वो वफ़ा और क़ुर्बानी, जिसने इतिहास को रोने पर मजबूर कर दिया विशेष रिपोर्ट
नई दस्तक
सच्चाई के साथ, हर कदम आपके साथ
कर्बला की अमर दास्तान: हज़रत अब्बास अलमबरदार की वो वफ़ा और क़ुर्बानी, जिसने इतिहास को रोने पर मजबूर कर दिया
विशेष रिपोर्ट
कर्बला (इराक़): इतिहास के पन्नों में वैसे तो कई जंगें और कुर्बानियां दर्ज हैं, लेकिन कर्बला की जंग में हज़रत इमाम हुसैन के भाई हज़रत अब्बास अलमबरदार (हज़रत अली के सुपुत्र) की वफ़ादारी, बहादुरी और सर्वोच्च बलिदान की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। आज भी जब कर्बला का ज़िक्र होता है, तो हज़रत अब्बास का नाम वफ़ा और भाईचारे के सर्वोच्च शिखर के रूप में लिया जाता है।
लश्कर-ए-हुसैनी के 'अलमबरदार' (ध्वजवाहक)
हज़रत अब्बास को इमाम हुसैन की सेना में सबसे ऊंचा मर्तबा हासिल था। वे इमाम हुसैन के लश्कर (सेना) के 'अलमबरदार' यानी मुख्य ध्वजवाहक थे। उनका विशाल और रौबदार व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्हें 'क़मर-ए-बनी हाशिर' (बनी हाशिम का चांद) कहा जाता था। उनकी बहादुरी से यज़ीद की भारी-भरकम सेना भी खौफ खाती थी।
भूखे-प्यासे बच्चों के लिए 'सक़्क़ा' (पानी लाने वाला) बनना
मुहर्रम की 7 तारीख से ही यज़ीदी फौज ने इमाम हुसैन के खेमों (शिविरों) पर पानी बंद कर दिया था। 10 मुहर्रम (आशूरा) तक आते-आते छोटे-छोटे बच्चे, जिनमें इमाम हुसैन की 4 साल की बेटी बीबी सकीना भी शामिल थीं, प्यास से तड़प रहे थे।
बच्चों का सूखा हलक और रोना हज़रत अब्बास से बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने जंग करने के लिए नहीं, बल्कि केवल बच्चों के लिए पानी लाने की इजाज़त इमाम हुसैन से मांगी। इमाम ने भारी मन से उन्हें विदा किया।
फरात नदी पर हज़रत अब्बास की वीरता और 'वफ़ा'
हज़रत अब्बास हाथ में मशक (पानी का चमड़े का थैला) और अलम (परचम) लेकर फरात नदी की तरफ बढ़े। यज़ीद के हज़ारों सैनिकों के घेरे को चीरते हुए वे नदी के किनारे पहुंच गए।
ऐतिहासिक वफ़ा का वो पल: जब हज़रत अब्बास ने नदी के पानी में अपने हाथ डाले, तो उन्होंने पानी की अंजलि भरी। वे तीन दिन के प्यासे थे, लेकिन जैसे ही उन्हें याद आया कि उनके भाई इमाम हुसैन और छोटे बच्चे खेमे में प्यासे हैं, उन्होंने पानी वापस नदी में गिरा दिया और खुद एक बूंद भी नहीं पी। इतिहास में वफ़ादारी का ऐसा उदाहरण कहीं नहीं मिलता।
पीठ पीछे हमला और शहादत का वो दर्दनाक मंज़र
मशक में पानी भरकर जब हज़रत अब्बास वापस खेमों की तरफ लौट रहे थे, तो यज़ीदी फौज ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। वे सामने से लड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे, इसलिए झाड़ियों और खजूर के पेड़ों के पीछे से छिपकर वार किया गया।
बाजू काटे गए: एक कातिलाना हमले में हज़रत अब्बास का सीधा हाथ काट दिया गया। उन्होंने मशक को उल्टे हाथ में थाम लिया। कुछ ही देर में उनका उल्टा हाथ भी काट दिया गया।
दांतों से मशक को थामा: दोनों हाथ कट जाने के बाद भी इस अजीम योद्धा ने हिम्मत नहीं हारी और पानी की मशक को अपने दांतों से पकड़ लिया ताकि बच्चों तक पानी पहुंच सके।
मशक पर तीर और शहादत: ज़ालिमों ने एक तीर पानी की मशक पर मारा, जिससे सारा पानी बह गया। इसके बाद एक तीर हज़रत अब्बास की आंख में लगा और एक भारी गुरज़ (गदा) उनके सर पर मारा गया।
हज़रत अब्बास घोड़े से ज़मीन पर गिरे और उन्होंने अपने भाई इमाम हुसैन को पुकारा। इमाम हुसैन जब उनके पास पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि "आज मेरी कमर टूट गई और मेरी ताकत खत्म हो गई।" हज़रत अब्बास ने भाई की गोद में दम तोड़ दिया।
आज भी वफ़ा का प्रतीक है उनकी दरगाह
आज इराक के कर्बला शहर में हज़रत अब्बास अलमबरदार का रौज़ा (मज़ार) इमाम हुसैन के रौज़े के ठीक सामने स्थित है। हर साल दुनिया भर से करोड़ों लोग उनकी वफ़ादारी को सलाम करने वहां पहुंचते हैं।
हज़रत अब्बास की यह क़ुर्बानी महज़ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि ज़ुल्म के खिलाफ डटने, अपने वचनों को निभाने और भाई के प्रति अटूट निष्ठा की वो मिसाल है, जो कयामत तक इंसानियत को रास्ता दिखाती रहेगी।
- ब्यूरो रिपोर्ट, नई दस्तक
मुनव्वर अली साबरी
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0
