पीली चादरों फूलों और कव्वाली के सुरों से महकी निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह: सूफी बसंत का अनूठा उत्सव
मुनव्वर अली साबरी
पीली चादरों और कव्वाली के सुरों से महकी निज़ामुद्दीन दरगाह: सूफी बसंत का अनूठा उत्सव
नई दिल्ली: जहाँ पूरा देश बसंत पंचमी के अवसर पर मां सरस्वती की आराधना और ऋतु परिवर्तन का स्वागत कर रहा है, वहीं दिल्ली की ऐतिहासिक हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह एक अलग ही रंग में रंगी नज़र आई। यहाँ सदियों पुरानी परंपरा को निभाते हुए 'सूफी बसंत' का त्योहार बेहद धूमधाम और अकीदत के साथ मनाया गया।
पीले रंगों में डूबा आस्ताना
दरगाह के परिसर में आज हर तरफ बसंती छटा बिखरी दिखी। जायरीन (श्रद्धालु) पीले वस्त्र पहनकर और हाथों में सरसों के पीले फूल लेकर हज़रत निज़ामुद्दीन और उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो को खिराज-ए-अकीदत पेश करने पहुँचे। मज़ार पर पारंपरिक पीली चादर चढ़ाई गई और पूरे आस्ताने को गेंदे के फूलों से सजाया गया।
700 साल पुरानी परंपरा का इतिहास
मान्यता है कि इस परंपरा की शुरुआत 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने की थी। कहा जाता है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपने भांजे के निधन के बाद गहरे शोक में थे। उन्हें खुश करने के लिए अमीर खुसरो ने हिंदू किसानों को पीले वस्त्र पहनकर और सरसों के फूल लेकर जाते देखा। उन्होंने भी पीला लिबास धारण किया और बसंत के गीत गाते हुए अपने गुरु के पास पहुँचे, जिससे निज़ामुद्दीन औलिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई। तब से यह परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बन गई है।
कव्वाली और रूहानी माहौल
उत्सव का मुख्य आकर्षण दरगाह के आंगन में होने वाली विशेष कव्वाली रही। मशहूर कव्वालों ने अमीर खुसरो द्वारा रचित कलाम जैसे— "सकल बन फूल रही सरसों..." गाकर माहौल को रूहानी बना दिया।
"यह त्योहार केवल एक धर्म का नहीं, बल्कि मानवता और प्रेम का प्रतीक है। यहाँ हिंदू, मुस्लिम और हर धर्म के लोग मिलकर बसंत मनाते हैं, जो भारत की साझी संस्कृति को दर्शाता है।" — दरगाह के एक खादिम
मुख्य विशेषताएं:
सांप्रदायिक सौहार्द: यह उत्सव भारतीय सूफीवाद और लोक संस्कृति के मिलन का सबसे बड़ा उदाहरण है।
विशेष पकवान: इस अवसर पर मीठे पीले चावल (ज़र्दा) भी बांटे गए।
प्रवेश: सुबह से ही दिल्ली के विभिन्न हिस्सों से लोग फूलों के जुलूस के साथ दरगाह पहुँचे।
यह सूफी बसंत हमें याद दिलाता है कि खुशियाँ और त्योहार सरहदों और मजहबों से ऊपर होते हैं।
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