मौला इमाम हुसैन (अ.स.): मानवता और सत्य सब्र और इंसाफ के प्रतीक का जन्म ​इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने, शाबान की 3 तारीख को दुनिया भर के मुसलमान 'यौम-ए-विलादत' के रुप में मनाते हैं

Jan 22, 2026 - 16:19
Jan 22, 2026 - 16:37
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मौला इमाम हुसैन (अ.स.): मानवता और सत्य सब्र और इंसाफ के प्रतीक का जन्म ​इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने, शाबान की 3 तारीख को दुनिया भर के मुसलमान 'यौम-ए-विलादत' के रुप में मनाते हैं

मौला इमाम हुसैन (अ.स.): मानवता और सत्य सब्र और इंसाफ प्रतीक का जन्म
​इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने, शाबान की 3 तारीख को दुनिया भर के मुसलमान 'यौम-ए-विलादत'

मुनव्वर अली साबरी 

(जन्मदिन) के रूप में मनाते हैं। मदीना मुनव्वरा में( 4) हिजरी( 3) शाबान  (8)जनवरी सन 626 में आज ही के दिन इमाम हुसैन का जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर कर्बला के मैदान में अपने बलिदान से मानवता और न्याय की एक ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी गूँज आज भी सुनाई देती है।
​जन्म और पालन-पोषण


​इमाम हुसैन के जन्म पर स्वयं पैगंबर हज़रत मोहम्मद स.अ. व. ने खुशी भारी खुशी का इज़हार किया था। कहा जाता है कि पैगंबर
हज़रत मुहम्मद स.अ.व.
ने उनके कान में अज़ान दी और उनका नाम 'हुसैन' रखा, जिसका अर्थ है 'बेहतरीन' या 'बे इंतहा खूबसूरत'। उनका बचपन सीधे पैगंबर मुहम्मद स.अ.व.की देखरेख में बीता। पैगंबर मुहम्मद स.अ.व.का उनके प्रति प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने फरमाया:
​"हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ।"
​व्यक्तित्व की विशेषताएँ


​इमाम हुसैन केवल एक आध्यात्मिक नेता ही नहीं, बल्कि उच्च नैतिक मूल्यों के प्रतीक थे। उनके व्यक्तित्व में कुछ प्रमुख गुण समाहित थे:
​असीम धैर्य: वे हर विपरीत परिस्थिति में शांत और अडिग रहते थे।
​दानशीलता: उनके द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा।
​न्यायप्रियता: उन्होंने हमेशा ज़ुल्म के खिलाफ और हक (सत्य) के लिए आवाज़ बुलंद की।
​3 शाबान का महत्व
​यह दिन केवल उत्सव का ही नहीं, बल्कि उनके द्वारा सिखाए गए सिद्धांतों को याद करने का भी है। इमाम हुसैन ने सिखाया कि:
​झूठ के आगे सिर न झुकाना: भले ही इसके लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।
​मानवता की सेवा: धर्म और जाति से ऊपर उठकर इंसानियत की रक्षा करना।
​आध्यात्मिक शुद्धि: अपने चरित्र को नेक और सच्चा बनाना।
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​कैसे मनाया जाता है यह दिन?
​दुनिया भर में लोग इस दिन को विभिन्न तरीकों से मनाते हैं:
​महफिल और जलसे: मस्जिदों और इमामबाड़ों में उनकी शान में कविता (मनकबत) पढ़ी जाती हैं। फातिहा ख़्वानी 
​नज़्र और नियाज़: गरीबों को खाना खिलाया जाता है और मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं।
​चरागाँ (रोशनी): घरों और धार्मिक स्थलों को दीयों और लाइटों से सजाया जाता है।
​निष्कर्ष
​इमाम हुसैन का जन्म पूरी मानवता के लिए एक संदेश है कि सत्य अमर है। 3 शाबान की यह तारीख हमें याद दिलाती है कि एक सच्चा इंसान वही है जो समाज में शांति, न्याय और करुणा का प्रसार करे।

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