बुक सेलर और निजी स्कूलों की मोनोपली के चलते अभिभावकों को जबरदस्ती स्कूल बैग थोपा जा रहा है स्कूल बेग नही खरीदने पर बुक सेलर कोर्स देने से भी इंकार कर देता है अभिभावकों की शिकायत पर मुख्य शिक्षा अधिकारी नरेश हल्दिया ने बीओ को जांच के आदेश दिए।

May 6, 2026 - 14:56
May 6, 2026 - 21:23
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बुक सेलर और निजी स्कूलों की मोनोपली के चलते अभिभावकों को जबरदस्ती स्कूल बैग थोपा जा रहा है स्कूल बेग नही खरीदने पर बुक सेलर कोर्स देने से भी इंकार कर देता है अभिभावकों की शिकायत पर मुख्य शिक्षा अधिकारी नरेश हल्दिया ने बीओ को जांच के आदेश दिए।

मुनव्वर अली साबरी 

रूड़की:-  (नई दस्तक) नए शैक्षणिक सत्र के आगाज के साथ ही जहां बच्चों में उत्साह देखा जा रहा है, वहीं अभिभावकों के सामने बढ़ते खर्चों ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं। रुड़की क्षेत्र में प्राइवेट स्कूलों और चुनिंदा बुक सेंटरों की मिलीभगत के आरोपों ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला तब सामने आया जब पिरान कलियर निवासी एक अभिभावक ने मुख्य शिक्षा अधिकारी को शिकायत देकर अपनी पीड़ा जाहिर की। शिकायत के मुताबिक, जब वह अपने बच्चे के लिए नए सत्र की किताबें खरीदने रुड़की के सिविल लाइन स्तिथ केम्ब्रिज बुक सेंटर पर पहुंचे, तो वहां उन्हें केवल किताबें ही नहीं, बल्कि जबरन स्कूल बैग भी खरीदने के लिए मजबूर किया गया। दुकानदार ने साफ शब्दों में कहा कि बिना बैग लिए कोर्स उपलब्ध नहीं कराया जाएगा।

अभिभावक के विरोध के बावजूद जब किताबें देने से इनकार कर दिया गया, तो मजबूरी में उन्हें तय कीमत से अधिक दाम पर बैग खरीदना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि संबंधित स्कूल का पूरा कोर्स किसी अन्य दुकान पर उपलब्ध ही नहीं है, जिससे अभिभावकों के पास विकल्प भी नहीं बचता।

अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या स्कूल प्रशासन और बुक सेंटर संचालकों के बीच ‘कमीशन का खेल’ चल रहा है? क्या अभिभावकों की जेब पर डाका डालने के लिए इस तरह की रणनीति बनाई जा रही है? और सबसे अहम—क्या शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की जबरदस्ती को अनदेखा किया जा सकता है?

मुख्य शिक्षा अधिकारी नरेश कुमार हल्दयानी ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच कर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन सवाल यही है कि क्या यह जांच अभिभावकों को राहत दिला पाएगी या फिर हर साल की तरह यह मुद्दा भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

फिलहाल, नए सत्र की शुरुआत के साथ ही अभिभावकों की उम्मीदें और परेशानियां दोनों ही बढ़ती नजर आ रही हैं—अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस ‘किताबी खेल’ पर कब और कैसे लगाम लगाते हैं।

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