इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, शबे-बारात वह रात है जब अल्लाह अपने बंदों के लिए रहमत के दरवाजे खोल देता है।

Feb 3, 2026 - 15:51
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इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, शबे-बारात वह रात है जब अल्लाह अपने बंदों के लिए रहमत के दरवाजे खोल देता है।

मुनव्वर अली साबरी (नई दस्तक ब्यूरो)

शाबान महीने की 14 तारीख की रात को शबे-बारात के रूप में मनाया जाता है। इस्लामिक कैलेंडर में इस रात का बहुत बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसे 'अल्लाह की रहमत की रात' और 'छुटकारे की रात' भी कहा जाता है।


शबे-बारात: तौबा, बरकत और मगफिरत की रात
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, शबे-बारात वह रात है जब अल्लाह अपने बंदों के लिए रहमत के दरवाजे खोल देता है। 'शब' का अर्थ है रात और 'बारात' का अर्थ है बरी होना या छुटकारा पाना। यानी वह रात जिसमें गुनाहों से माफी मिले।


1. तौबा और मगफिरत (माफी) की रात
इस रात की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अल्लाह रब्बुल आलमीन अपने बंदों की पुकार सुनता है। हदीसों के मुताबिक, इस रात अल्लाह दुनिया के आसमान पर नुज़ूल फरमाता है और सदा देता है— "है कोई जो मुझसे माफी मांगे और मैं उसे माफ कर दूँ? है कोई रिज़्क (रोजी) मांगने वाला कि मैं उसे अता करूं फैसलों की रात (लाइलतुल बराह)


कहा जाता है कि इस मुकद्दस रात में अगले एक साल के लिए इंसानों के भाग्य के फैसले किए जाते हैं।
 किसे रिज़्क दिया जाएगा?
 किसकी पैदाइश होगी और किसकी वफात (मृत्यु) होगी?
   इन तमाम उमूर (कार्यों) की फेहरिस्त फरिश्तों के सुपुर्द की जाती है।
3. इबादत और नफिल नमाज़ें
मुसलमान इस पूरी रात जागकर अल्लाह की इबादत करते हैं। कुरान की तिलावत, ज़िक्र-ओ-अज़कार और नफिल नमाज़ें पढ़ी जाती हैं। लोग अपने गुनाहों के लिए रो-रोकर दुआएं मांगते हैं और नेक राह पर चलने का संकल्प लेते हैं।
4. पूर्वजों की याद (ज़ियारत-ए-कुबूर)
शबे-बारात पर अपने उन रिश्तेदारों और अपनों को याद करने की भी रिवायत है जो इस दुनिया से जा चुके हैं। लोग कब्रिस्तानों में जाकर उनके हक में दुआ-ए-मगफिरत (शांति की प्रार्थना) करते हैं और 'ईसाले सवाब' करते हैं।
5. रोज़ा रखना


15 शाबान के दिन (यानी रात के अगले दिन) रोज़ा रखने की भी बहुत फजीलत बताई गई है। यह नफली रोज़ा अल्लाह की रज़ा हासिल करने का एक बेहतरीन ज़रिया माना जाता है।
6. रोशनी और सदका-खैरात
इस रात घरों और मस्जिदों में सफाई और रोशनी की जाती है। साथ ही, गरीबों और मिस्कीनों को खाना खिलाना और दान (सदका) करना इस रात की खुशियों में चार चाँद लगा देता है।
> एक ज़रूरी बात: जहाँ यह रात इबादत की है, वहीं यह आत्म-मंथन की भी है। इस्लाम सादगी का संदेश देता है, इसलिए हमें आतिशबाजी या शोर-शराबे जैसी फिजूलखर्ची से बचकर अपना पूरा ध्यान अल्लाह की इबादत में लगाना चाहिए।

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